रचयिता – आचार्यश्री कौशलेन्द्रकृष्ण जी
   (कथावक्ता, श्लोककार, ग्रंथकार, कवि)

गाओ गाओ रे भुवनभास्कर की आरती गाओ॥

श्रीकमलाकृत नयन मनोहर,
स्वर्णिम मुकुट टंक मणि सुन्दर।
अलक पुलक सब वैभव को धर,
तिलक सकल अघ ओघ नाश कर।
अरुणोदय इव शुभ्र दीपवर सब मिल आज जलाओ।
गाओ गाओ…

कानों में मकराकृत कुण्डल,
अधर कुन्द कमनीय महाफल।
उष्ण रश्मि नित छवि अति शीतल,
सर्वलोक वन्दित वह मण्डल।
दर्शन से मन नित हो निर्मल जीवन सफल बनाओ।
गाओ गाओ…

कोटि अप्सरा बलि बलि जावैं,
श्रीवसुधा निक्षुभा कहावैं।
शची आदि नित महिमा गावैं,
रमा रूप संज्ञा मन भावैं।
सोहित श्रीछविधाम बनावै नित्य नयन चित लाओ।
गाओ गाओ…

नभ से पुष्पवृष्टि हो अविरल,
नारद वीणा नाद सुमंगल।
दण्डनाथ थिरकें चहुदिशि चल,
श्राद्धदेव के गुंजित करतल।
देख मृदंग बजावत पिंगल सब मिल जुल अब आओ।
गाओ गाओ…

जान्दकार जयकार लगावैं,
चामर अश्वकुमार डुलावैं।
षड्मुख शनि नित शंख बजावैं,
पंचानन डमरुक धर धावैं।
खग कल्माषादिक गण गावैं अब तो सुख सरसाओ।
गाओ गाओ…

नलिनी नित निरखत छवि छावैं,
पद्मस्थित हरि जन मन भावैं।
जो नित यह आरात्रिक गावैं,
श्रीचरणों में शीश नवावैं।
‘कौशलेन्द्र’ अतुलित सुख पावैं सकल मनोरथ पाओ।
गाओ गाओ…

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