रचयिता – आचार्यश्री कौशलेन्द्रकृष्ण जी
   (कथावक्ता, श्लोककार, ग्रंथकार, कवि)

हरिहयरूप हरे (जय) हरिहयरूप हरे।
श्रुतियों में प्रथमार्चित, कर में वज्र धरे। जय हरिहय…
हे काश्यप हे सुरपति, हे पर्जन्य करे।
हे वृत्रारि अवनि के, दानव नित्य डरे। जय हरिहय…
हे मेघालय के पति, दामिनि के स्वामी।
हे संक्रन्दन कौशिक, तुम अंतर्यामी। जय हरिहय…
घनमातंग महागज, महाकीर्ति राजे।
हे यज्ञेश शचीपति, शुचि सुयोग्य साजे। जय हरिहय…
नमुचि नेत्र साध्वस तुम, बल के भयदायक।
पणियों के संकट तुम, महायुद्ध नायक। जय हरिहय…
देवशुनी सरमा के, शक्तिरूप भर्ता।
आदिसर्ग में तुम ही, सर्व जगत कर्ता। जय हरिहय…
लोकार्णव के नृप तुम, जग के परिपालक।
शेषस्थित शंकर तुम, कल्पक्षयकारक। जय हरिहय…
तुम ही व्योम निवासी, घट घट के वासी।
मित्र वरुण त्वष्टा भग, दृष्टा अविनाशी। जय हरिहय…
मेघ निनाद करे नित, शम्पा नृत्य करे।
धर्मिष्ठों के मन से, भय के वृत्र टरे। जय हरिहय…
देवराज की आरति, जो कोई नर गावै।
‘कौशलेन्द्र’ मनवाच्छित, सुख सम्पति पावैं। जय हरिहय…

साझा करें (Share)