

रचयिता – आचार्यश्री कौशलेन्द्रकृष्ण जी
(कथावक्ता, श्लोककार, ग्रंथकार, कवि)
कृष्ण कृष्ण त्वमानन्दसिन्धुः स्वयं
चास्मदीया प्रभा नेत्रयोर्नन्दज।
त्वं कदा श्लेक्ष्यसे कातरान्नः प्रभो
दह्यमानाः प्रियास्त्वामतः शान्तिद॥१॥
हे कृष्ण! हे नन्दनन्दन! आप तो स्वयं आनन्द के अथाह सागर हैं और हमारे इन तरसते नेत्रों की एकमात्र ज्योति हैं। हे शान्तिदाता प्रभु! विरह की अग्नि में जलती हुई आपकी ये प्रियाएँ अत्यन्त कातर (व्याकुल) हो रही हैं, आप आकर कब इन्हें अपने अंक में भरेंगे?
किं न दृष्टास्त्वयास्मद्वने वीथयो
यत्र नो ते पदाब्जौ रजो वर्षतः।
टिङ्कुनादो न त्वन्नूपुरस्याथ वा
नोऽथ वा दिव्यसौन्दर्यपूर्णं मुखम्॥२॥
क्या आपने अपने बिना सूनी हो गई हमारे वन की उन गलियों को नहीं देखा? जहाँ अब आपके चरणकमल रज की वर्षा नहीं करते (धूलि नहीं उड़ाते)। जहाँ अब न तो आपकी पैंजनियों की वह मधुर झंकार ही सुनाई देती है, और न ही आपके उस दिव्य सौन्दर्य से छलकते मुखमण्डल के ही दर्शन होते हैं।
किन्न दृष्टास्त्वया वन्यपुष्पाङ्कुरा
नैव पुष्पन्ति वेतः परं दुःखिताः।
पूर्णिमारात्र्यवश्यायपीयूषवन्-
नैव शृण्वन्ति वेणुं तवानन्ददम्॥३॥
क्या आपने वन में उदास खड़ी उन कलियों (अंकुरों) को नहीं देखा, जो आपके वियोग में दुःखी होकर खिलना ही भूल गई हैं? क्योंकि अब उन्हें वह पूर्णिमा की रात्रि में गिरने वाली ओस रूपी अमृत के समान, शीतलता और आनन्द देने वाली आपकी वंशी की धुन सुनने को नहीं मिलती।
एकरात्रं विना लज्जया त्वां च याः
स्वीकृतास्ता व्ययन्त्यत्र नेत्रामृतम्।
सिञ्चिता भूमिरप्यश्रुभिस्तापकैः
श्यामलत्वं वने हन्त्यहो वै सखे॥४॥
हे सखे! जिस एक मिलन रात्रि में उन गोपियों ने लोक-लज्जा त्यागकर आपको अपना सर्वस्व मान लिया था, आज वे विरह में व्यर्थ ही अपने अश्रुओं की धारा बहा रही हैं। और आश्चर्य तो देखिए! उनके विरह ताप से जलते हुए उन गर्म आंसुओं से सिंचित होकर यह वन भूमि भी अपनी हरीभरी शोभा को भस्म (नष्ट) कर रही है।
सूर्यमुद्वीक्ष्य नानाङ्कुरा वन्यजा
वन्यशोभा हसन्तीव मोदान्विताः।
चन्द्रमुद्वीक्ष्य नृत्यन्ति यत्तारका-
स्त्यक्तलज्जास्तथा त्यक्तलज्जा वयम्॥५॥
जिस प्रकार सूर्योदय होते ही वन के विभिन्न अंकुर और वन्य-लताओं की शोभा मुदित होकर खिलखिला उठती है, और जिस प्रकार चन्द्रमा को देखकर तारागण अपनी लज्जा त्यागकर आकाश में नृत्य करने लगते हैं, ठीक उसी प्रकार आपको देखकर हम भी निर्लज्ज हो गईं हैं।
किं स्मरामीश विच्छेदरात्रिं मते-
र्वृत्रमेतत्प्रियाच्छादनं पक्षजम्।
चक्रवाकस्य या सन्निकृष्टा सदा
विस्मृता वै तया कालक्रीडागतिः॥६॥
हे ईश! मैं उस विरह की रात्रि का क्या ही स्मरण करूँ जब चकवी अपने प्रिय के वियोग में यह चिंतन करती है कि रात्रि का अंधकार अवश्य ही उसके प्रिय के पंखों के आवरणजन्य है। सदा से प्रिय के इतने समीप होने के कारण वह काल की उस क्रूर गति को ही भूल गई थी।
चिन्तयत्येवमामोदिता स्वव्यथे
यत्कुचस्यान्तिको मे प्रियः सर्वदा।
कीदृशी प्राप्तिरेषा न दृष्टं मुखं
पीतमेवापि नास्याधरस्यामृतम्॥७॥
(वह चकवी) अपनी उस विरह व्यथा में भी यह सोचकर प्रसन्न हो लेती है कि उसका प्रिय सदैव उसके वक्षस्थल से सटा हुआ है। किन्तु हा! यह कैसी प्राप्ति है? न तो वह अपने कान्त का मुखदर्शन ही कर पा रही है और न ही उसके अधरामृत का पान कर पा रही है।
वीक्षते चक्रवाकी विधुं वा सखे
कूजतीमं च मत्वा प्रियास्यं शुभम्।
सा न वेत्त्येव चन्द्रो न चानन्ददः
स्वामृताशां ददत्कुड्मलेभ्यो जलम्॥८॥
हे सखे! संभवतः वह विरहिणी चकवी आकाश में चन्द्रमा को देखकर उसे ही अपने स्वामी का सुन्दर मुख समझकर पुकारती है। वह भोली यह नहीं जानती कि यह चन्द्रमा उसे वह प्रेम का आनन्द नहीं दे सकता; यह तो अमृत का लोभ देकर कलियों को केवल पानी (ओस) दे देता है।
॥ इत्याचार्यश्रीकौशलेन्द्रशर्माप्रणीता विरहगीतिर्पूर्णा ॥







